टिहरीः फूलदेई त्यौहार मनाया ,जानिये फूलदेई पर्व की पौराणिक लोककथा

टिहरीः चैत्र माह के शुरू होने पर प्रतापनगर क्षेत्र के विभिन्न गांवों में बालिकाओं ने फूलदेई त्यौहार का स्वागत कर गांव के घरों में फूल बिखेरे। बालिकाओं ने विभिन्न प्रजातियों के फूलों को घर की चौखट में सजाकर फूलदेई पर्व की शुरुआत की। पहाड़ में संस्कृति के प्रतीक माने जाने वाले फूलदेई के मौके पर बुरांस, फ्योंली, आड़ू, लाईं, पययां के फूलों को टोकरी में लाकर गांव की हर चैखट पर डालकर परिवार को अपनी शुभकामनाएं देते हुए पहाड़ की बालिकाओं ने गांव की सुख, समृद्धि ,वैभव व सुख शांति की कामना की।
शनिवार को फूलदेई त्यौहार के मौके पर प्रतापनगर क्षेत्र में छोटे बच्चों ने रंग-बिरंगे फूल लोगों की चौखट पर डालकर सुख-संमृद्धि की कामना की। फूलदेई के इस त्यौहार को बुजुर्गों द्वारा खूब सराहा जा रहा है। ग्रामीण नरेंद्र सिंह, सोहनलाल सुंदर सिंह उमेद सिंह सहित कई ग्रामीणों ने बताया कि नई पीढ़ी द्वारा भी इस त्यौहार को आगे बढ़ने की ललक होने से जहां पर्यावरण को जीवित रखा जा सकता है। वहीं विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधों के प्रति भी लोगों की अटूट आस्था बनी रहेगी।
पौराणिक लोक कथाओं के अनुसार फ्योंली एक गरीब परिवार की बहुत सुंदर बालिका थी। एक बार गढ़ नरेश राजकुमार को जंगल में शिकार खेलते-खेलते देर हो गई। और रात को राजकुमार ने एक गांव में शरण ली उस गांव में राजकुमार ने फ्योंली को देखा तो वह उसके रूप में मंत्रमुग्ध हो गया। राजकुमार ने फ्योंली के माता-पिता से फ्योंली के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। फ्योंली के माता-पिता ने खुशी-खुशी राजकुमार के साथ ही फ्योंली का विवाह करवा दिया। शादी के बाद फ्योंली राजमहल में तो आ गई, लेकिन राजसीभैभव उसे एक कारागृह लगने लगा था। हर वक्त उसका मन अपने गांव में लगा रहता था। राजमहल की चकाचैंध से उसे असहजता महसूस होने लगा। फ्योंली ने राजकुमार से गांव जाने की बात की। गांव में फ्योली पहुंची तो गई लेकिन इस दौरान किसी गम में धीरे-धीरे कमजोर होने लगी। राजकुमार गांव आकर फ्योंली की अंतिम इच्छा पूछी तो उसने कहा कि मरने के बाद उसे उसी गांव के मुंडेर की मिट्टी में दफनाया जाए। फ्योंली की मृत्यु के बाद उस स्थान पर कुछ दिन बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिला। जिसे फ्योंली नाम दिया गया।


उसकी याद में कई सदियों से पहाड़ में फूलों का त्यौहार फूलदेई मनाया जाता है। फूलदेई के मौके पर ग्रामीणों की ओर से मिली खादय सामग्री से बच्चे मीठा चावल, खिचड़ी तैयार कर गांव की समृद्धि और उन्नति की कामना करते हैं। पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्य भगवान नारायण कुंभ राशि से मीन राशि में प्रवेश करने के साथ ही चैत्र मास से विक्रमी संवत शुरु हो जाता है।