अमर शहीद शिवराम राजगुरूः 112वीं जयंती पर श्रद्वाजंली


संजीव शर्मा,एन टी न्यूज़,हरिद्वारः भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े योद्धाओं में एक थे शिवराम हरि राजगुरु। वे भगत सिंह और सुखदेव के साथ हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम गए। शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...यही जज्बा वतन के लिए हंसते-हंसते जान लुटाने वाले शहीद वीर राजगुरू का था। शहीदों की फेहरिस्त में भगतसिंह और सुखदेव का नाम तब तक अधूरा रहता है, जब तक उनके साथ राजगुरू का नाम ना लिया जाए।


भारत के इस लाल का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। महाराष्ट्र का रहने वाला यह बलिदानी भी भगत सिंह और सुखदेव के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन मे भारत माता को मुक्ति के लिए शहीद हो गया।  
भगत सिंह व सुखदेव के साथ राजगुरू को भी 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। सच्चे देशभक्त राजगुरू का जन्म सन् 24 अगस्त 1908 में पुणे के पास खेड़ नामक गांव (वर्तमान में राजगुरु नगर) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मात्र 6 साल की अवस्था में इन्होंने अपने पिता को खो दिया था। पिता के निधन के बाद राजगुरू वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे।
बचपन से ही राजगुरु के अंदर जंग-ए-आजादी में शामिल होने की ललक थी। वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से वे इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गए, उस वक्त उनकी उम्र मात्र 16 साल थी। अब इनका और उनके साथियों का मुख्य मकसद ब्रिटिश अधिकारियों के मन में खौफ पैदा करना था। इसलिए वे जगह जगह घूम-घूम कर लोगों को जागरूक करते थे और जंग-ए-आजादी के लिये जागृत करते थे।


महात्मा गांधी के विचारों के विपरीत राजगुरु क्रांतिकारी तरीके से हथियारों के बल पर आजादी हासिल करना चाहते थे, उनके कई विचार महात्मा गांधी के विचारों से मेल नहीं खाते थे। आजाद की पार्टी में राजगुरू को रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था। पण्डित चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे।


19 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस ऑफीसर जे0पी0 साण्डर्स की हत्या को राजगुरू ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर योजनाबद्व किया था। असल में यह वारदात लाला लाजपत राय की मौत का बदला थी, जिनकी मौत साइमन कमीशन का विरोध करते वक्त हुई थी।


उसके बाद 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली में सेंट्रल असेम्बली में हमला करने में राजगुरु का बड़ा हाथ था। राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव का खौफ ब्रिटिश प्रशासन पर इस कदर हावी हो गया था कि इन तीनों को पकड़ने के लिये पुलिस को विशेष अभियान चलाना पड़ा। जिसके कारण राजगुरु नागपुर में जाकर छिप गये। वहां उन्होंने आरएसएस कार्यकर्ता के घर पर शरण ली। वहीं पर उनकी मुलाकात डा. के0बी0 हेडगेवार से हुई, जिनके साथ राजगुरु ने आगे की योजना बनायी। इससे पहले कि वे आगे की योजना पर चलते, पुणे जाते वक्त पुलिस ने राजगुरू को गिरफ्तार कर लिया। बाद में इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया गया। उसके बाद इन तीनों अमर बलिदानियों का अंतिम संस्कार पंजाब के फिरोजपुर जिले में सतलज नदी के तट पर हुसैनवाला में किया गया।