'मुझे ग़म से निभाना गर नहीं आताःबलजीत सिंह 'बेनाम'


बलजीत सिंह 'बेनाम' की ग़ज़लः मुझे ग़म से निभाना गर नहीं आता


मुझे ग़म से निभाना गर नहीं आता,
ख़ुशी का ज़िंदगी भर दर नहीं आता।


जिसे मंज़िल को पाने का जुनूँ हो,
सफ़र से लौट कर वो घर नहीं आता।


हिमायत तू जो करता ज़ालिमों की,
कभी इल्ज़ाम तेरे सर नहीं आता।


सभी से पूछता है हाल ए दिलबर,
मगर ख़ुद जा तसल्ली कर नहीं आता।


मुझे ग़म से निभाना गर नहीं आता,


                                                   बलजीत सिंह बेनाम


संक्षिप्त परिचयः


                     बलजीत सिंह 'बेनाम' एक संगीत अध्यापक हैं आप विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ करते रहते हैं आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं ।